दुनिया के ऐ मुसाफ़िर मंज़िल तेरी क़बर है / Duniya Ke Aye Musafir Manzil Teri Qabar Hai
दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है जब से बनी है दुनिया लाखों-करोड़ों आए बाक़ी रहा न कोई, मिट्टी में सब समाए इस बात को न भूलो, सब का यही हशर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है आँखों से तू ने अपनी देखे कई जनाज़े हाथों से तू ने अपने दफ़नाए कितने मुर्दे अंजाम से तू अपने क्यूँ इतना बे-ख़बर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है ये 'आलिशान बंगले किसी काम के नहीं हैं महलों में सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं दो गज़ ज़मीं का टुकड़ा छोटा सा तेरा घर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मख़मल पे सोने वाले मिट्टी में सो रहे हैं शाह-ओ-गदा यहाँ पर सब एक हो रहे हैं दोनों हुए बराबर, ये मौत का असर है दुनिया के ऐ मुसाफ़िर ! मंज़िल तेरी क़बर है तय कर रहा है जो तू दो दिन का ये सफ़र है मिट्टी के पुतले ! तू ने मिट्टी में है समाना इक दिन यहाँ तू आया, इक दिन यहाँ से जाना रुकना नहीं यहाँ पर, जारी तेरा सफ़र है दुनिया के...